ध्यान का अर्थ है बिखरे हुए मन को समेटकर धीरे-धीरे भीतर की ओर ले जाना। गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य की दृष्टि में यह साधना का अंतर्हृदय है — वह पथ जिसके द्वारा मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप और परमात्मा से अपने संबंध को पुनः पहचानता है। ध्यान मन को ज़बरदस्ती खाली करना नहीं, बल्कि उसे एक स्पष्ट दिशा देना है। धैर्य के साथ चंचल मन शांत होता है, अंतःकरण निर्मल होता है, और जीवन को एक स्थिर, सौम्य केंद्र मिलता है।
ध्यान योग — मन को साधना
गुरुदेव कहते हैं, मन जंगली हाथी जैसा है — अपार शक्तिशाली, पर बेलगाम भागने वाला। ध्यान वह रस्सी है जो उसे सौम्यता से साधती है, ताकि उसकी शक्ति शुभ की ओर मुड़ सके। यदि सँभाला न जाए, तो मन की ऊर्जा बिखरकर व्यर्थ हो जाती है — जैसे धूप हर ओर पड़े पर कुछ भी न तपाए। पर जब वही धूप काँच से एकाग्र होती है, तो आग जला देती है। यही एकाग्रता का शांत चमत्कार है — मन की बिखरी धाराओं को समेटकर एक दिशा देना। पर इसका गहरा उद्देश्य है स्मरण — यह जागना कि हम वस्तुतः कौन हैं, और परमात्मा से अपने संबंध को फिर अनुभव करना। यह संबंध जैसे-जैसे अनुभव होता है, जीवन का भय और बेचैनी घटने लगती है।
- मन जंगली हाथी है; ध्यान वह रस्सी जो उसे साधती है
- बिखरी ऊर्जा व्यर्थ जाती है; एकाग्र ऊर्जा शांत चमत्कार करती है
- लक्ष्य है स्मरण — यह जागना कि हम वास्तव में कौन हैं
ध्यान की दो राहें — साकार और निराकार
गुरुदेव ने हमें ध्यान की दो सौम्य राहें सिखाईं, और दोनों किसी प्रतीक से आरंभ होती हैं। साकार उपासना में साधक किसी प्रिय रूप पर ध्यान करता है — जैसे प्रकाश के कोमल गोले के भीतर गायत्री माता का दर्शन, और धीरे-धीरे वैसी ही आत्मीय निकटता का अनुभव, जैसी एक शिशु अपनी माँ के प्रति अनुभव करता है। निराकार उपासना में रूप का स्थान प्रकाश ले लेता है — प्रायः सविता, उगते सूर्य की तेजोमयी ऊर्जा, जिसकी स्वर्णिम किरणें शरीर, मन और अंतःकरण में रच-बस जाती हैं। गायत्री मंत्र वही सेतु है जो इस प्रकाश का आवाहन करता है। राह कोई भी हो, सबसे महत्वपूर्ण है पूर्ण निश्चलता नहीं, बल्कि हार्दिक भाव और सहज समर्पण। परमात्मा आँखों से नहीं दिखता — वह तो विचार, वाणी और कर्म में बढ़ती सद्भावना के रूप में ही जाना जाता है।
- साकार — किसी प्रिय रूप पर ध्यान, जैसे प्रकाश-गोले में गायत्री माता
- निराकार — प्रकाश पर ही ध्यान, सविता (सूर्य) की स्वर्णिम किरणें
- सबसे ज़रूरी है हार्दिक भाव और सहज समर्पण, ज़बरदस्ती नहीं
आरंभ कैसे करें — सहजता से, बिना जल्दबाज़ी के
नए साधक अक्सर सोचते हैं कि ध्यान का अर्थ है बिल्कुल खाली, निश्चल मन। गुरुदेव यहाँ आश्वस्त करते हैं — वह गहरी निश्चलता (समाधि) लंबे अभ्यास के बाद ही आती है, और उसे जल्दी पाने की होड़ केवल निराशा देती है। आरंभ में असली काम सरल है — भटकते मन को बार-बार, धीरे से, एक चुने हुए बिंदु पर लौटा लाना। इतना ही पर्याप्त है कि विचारों का प्रवाह एक दिशा में मुड़ जाए। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर बैठें, यथासंभव प्रातःकाल की शांति में, मन में उगते सूर्य या किसी प्रिय रूप को कोमलता से धारण करते हुए। भाव को आगे चलने दें, ज़ोर को नहीं। नित्य अभ्यास से कुछ शांत क्षण भी धीरे-धीरे अंतःकरण को नया रूप दे देते हैं।
- खाली मन के पीछे न भागें — बस सहजता से एक बिंदु पर लौटें
- प्रतिदिन निश्चित समय, यथासंभव प्रातःकाल, अभ्यास को दृढ़ करता है
- भाव को आगे रखें, ज़ोर को नहीं — आरंभ के लिए कुछ शांत क्षण ही काफ़ी
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